पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को ₹2.87 लाख करोड़ के रिकॉर्ड अधिशेष हस्तांतरण को स्वीकृति प्रदान की है।
आर्थिक पूंजी रूपरेखा (ECF)
- आर्थिक पूंजी रूपरेखा (ECF) यह निर्धारित करती है कि RBI अपनी पूंजीगत आरक्षित निधियों का प्रबंधन किस प्रकार करेगा तथा सरकार को कितना अधिशेष हस्तांतरित कर सकता है।
- इसका प्रारूप मूलतः बिमल जालान समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया था तथा इसे वर्ष 2019 में RBI की 578वीं बैठक में अपनाया गया।
- बिमल जालान समिति ने ECF की प्रत्येक पाँच वर्ष में समीक्षा किए जाने की अनुशंसा की थी।
RBI की आय के स्रोत एवं लाभांश निर्धारण की प्रक्रिया
- यद्यपि RBI का प्राथमिक उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता बनाए रखना है।
- इसके प्रमुख कार्यों में शामिल हैं—
- मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करना (मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना),
- मुद्रा निर्गमन का प्रबंधन,
- विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन,
- बैंकिंग प्रणाली का विनियमन,
- तथा सरकारी ऋण का प्रबंधन।
- इन कार्यों के बावजूद, RBI की गतिविधियों के परिणामस्वरूप लाभ उत्पन्न हो सकता है।
- RBI की आय के प्रमुख स्रोत:
- अपने पास धारित सरकारी प्रतिभूतियों पर प्राप्त ब्याज।
- बैंकों को ऋण प्रदान करने से प्राप्त आय (जैसे—रेपो परिचालन)।
- विदेशी मुद्रा परिचालनों (डॉलर की खरीद एवं बिक्री) से प्राप्त आय।
- सिग्नियोरेज — मुद्रा मुद्रण से प्राप्त लाभ (क्योंकि मुद्रा छापने की लागत उसके अंकित मूल्य से कम होती है)।
- बाजार परिचालन — तरलता नियंत्रण हेतु परिसंपत्तियों की खरीद-बिक्री से प्राप्त ब्याज अथवा पूंजीगत लाभ।

RBI की बढ़ती राजकोषीय भूमिका से जुड़ी चिंताएँ
- केंद्रीय बैंक का राजकोषीयकरण: RBI का मूल दायित्व मूल्य स्थिरता एवं वित्तीय स्थिरता बनाए रखना है।
- अधिशेष हस्तांतरण की राशि के लगातार बढ़ने और अधिक बार होने से मौद्रिक नीति के उद्देश्यों तथा सरकार की राजकोषीय आवश्यकताओं के बीच की सीमा अस्पष्ट हो सकती है।
- राजकोषीय अनुशासन के लिए जोखिम: बड़े अधिशेष हस्तांतरण सरकार को अतिरिक्त राजकोषीय संसाधन उपलब्ध कराते हैं।
- इससे सब्सिडियों के युक्तिकरण तथा सार्वजनिक व्यय की दक्षता में सुधार जैसे संरचनात्मक सुधारों को लागू करने की तात्कालिकता कम हो सकती है।
- स्थायित्व संबंधी चिंताएँ: RBI की आय का एक बड़ा भाग विदेशी मुद्रा परिचालनों, आरक्षित निधि प्रबंधन तथा वित्तीय परिसंपत्तियों पर प्राप्त प्रतिफलों से आता है।
- ये आय वैश्विक ब्याज दरों, विनिमय दरों के उतार-चढ़ाव तथा वित्तीय बाजार की परिस्थितियों से प्रभावित होती हैं।
- चूँकि ये आय स्वभावतः अस्थिर होती हैं, इसलिए इन्हें राजस्व का स्थायी स्रोत मानना भविष्य में राजकोषीय जोखिम उत्पन्न कर सकता है।
आगे की राह
- RBI के मौद्रिक नीति संबंधी निर्णयों को राजकोषीय विचारों से प्रभावित नहीं होना चाहिए।
- आरक्षित निधियों के प्रबंधन तथा अधिशेष की गणना के संबंध में अधिक पारदर्शिता एवं प्रकटीकरण आवश्यक है, जिससे जनता का विश्वास सुदृढ़ हो सके।
- सरकारों को RBI से प्राप्त अधिशेष को पूरक राजस्व के रूप में देखना चाहिए, न कि स्थायी राजकोषीय संसाधन के रूप में।
- बाह्य आघातों एवं आर्थिक संकटों की स्थिति में वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए RBI को पर्याप्त सुरक्षात्मक आरक्षित निधियाँ बनाए रखनी चाहिए।
Source: TH
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